Thursday, 21 March 2013

मैं औरत हूँ

थोड़ा सा सुकून मिले तो सोच लूं,
मैं भी एक इन्सान हूँ,
नहीं हूँ मैं मुर्दा जिस्म,
मैं भी इक जान हूँ,

ये सुकून मिले ही तो कहाँ मिले?
अपनों में?
या सपनो में ?
क्यों की मैं औरत हूँ,
परायों में खोज जो सुकून पाया
उठ गयी आवाज़ मैं बेगैरत हूँ,
...क्यों की मैं एक औरत हूँ???

पूजते हैं बुत बना कर,
देखते हैं बुत बना कर,
न मैं मिट्टी हूँ,
न मैं पत्थर ,
फिर क्यों मैं इक मूरत हूँ,
... क्या सिर्फ इसलिए
की मैं एक औरत हूँ ??

मान सम्मान जो मुझसे जुड़ा है
सिर्फ तुम्हारी आँखों का नशा है,
जिस्म भेदते तुम हो मेरा,
और शील मेरा भंग हुआ करता है ?
मैं नहीं महज़ एक जिस्म,
नही महज़ मैं खूबसूरत हूँ,
मैं इस जहां की,
इस दुनिया के परिवार की,
इस संसार की ज़रुरत हूँ,
क्यों की मैं ...
औरत हूँ ..
क्योकि मैं औरत हूँ …

2 comments:

  1. एकदम मन को छू गयी ,बहुत - बहुत शुभकामनाएँ !

    ReplyDelete

तह-ए- दिल से शुक्रिया ..आप के मेरे ब्लॉग पर आने का , पढने का ,..और मेरा उत्साहवर्धन करने का। आपके मूल्यवान सुझाव, टिप्पणियाँ और आलोचना , सदैव आमंत्रित है। कृपया बताना न भूलें कि आपको पोस्ट कैसी लगी.